हर सीने में लाक्षागृह है अधर – अधर पर कोलाहल है, संघर्षों की समरभूमि में हमसे पूछो हम कैसे हैं : डॉ. हरिओम पंवार

एक गीत : डॉ. हरिओम पंवार

हर मानव के सर गोवर्धन

हाथों में अर्जुन के रथ हैं।

आँखों में खारे सागर हैं

मन में कई महाभारत हैं।।

इच्छाओं के कुरुक्षेत्र में हर एक भीष्म का प्रण घायल है

हर सीने में लाक्षागृह है अधर – अधर पर कोलाहल है

संघर्षों की समरभूमि में हमसे पूछो हम कैसे हैं

कालचक्र के चक्रव्यूह में हम भी अभिमन्यु जैसे हैं

और बची पहचान हमारी कोने फ़टे हुए से ख़त हैं।

आँखों में खारे सागर हैं मन में कई महाभारत हैं।।

हमने परम्परायें तोड़ी यूँ पूजा भौतिकीकरण को

जैसे गीत व्याकरण तज दे अनुप्रासों के समीकरण को

मर्यादाएं अपमानित हैं चीरहरण के इतिहासों से

हम भी अपनापन हारे हैं मन के शकुनी के पासों से

और हमारी उम्मीदों की आकाशी गंगा आहत हैं।

आँखों में खारे सागर हैं मन में कई महाभारत हैं।।

एक कुँआरा तन अपराधी रण में अर्जुन करण लड़ें हैं।

हम भी अपने पाप छुपाकर कुंती जैसे मौन खड़े हैं

खुदगर्जी का अभिनन्दन है औ’ खुद्दार सलाखों पर हैं

गंधारी माँ जैसी पट्टी अपनी सबकी आँखों पर है

यह तो वक्त करेगा निर्णय कौन सही हैं कौन गलत हैं।

आँखों में खारे सागर हैं मन में कई महाभारत हैं।।

-डॉ. हरिओम पंवार

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