मोहक मीडिया। उत्तराखंड की में एक मंदिर है जहाँ रक्षा बंधन लगभग कहीं और जैसा नहीं मनाया जाता।
चमोली के बंसी नारायण मंदिर में, स्थानीय समुदाय श्रावण पूर्णिमा के दिन भगवान नारायण की पूजा करने के लिए यात्रा करते हैं।
बंसी नारायण मंदिर से जुड़ी पौराणिक मान्यता भगवान विष्णु और राजा बलि की कथा से जुड़ी है। मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण कर राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी। राजा बलि ने अपना सर्वस्व दान कर दिया और तीसरे पग के लिए अपना सिर भगवान के सामने कर दिया। भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का राजा बनाया।
कथा के अनुसार, राजा बलि ने भगवान विष्णु से अपने द्वारपाल के रूप में रहने का आग्रह किया। जब माता लक्ष्मी को इसका पता चला तो नारद मुनि ने उन्हें रक्षाबंधन के दिन राजा बलि को राखी बांधने का उपाय बताया। इसी पौराणिक मान्यता से बंसी नारायण में रक्षाबंधन के दिन भगवान को राखी अर्पित करने की परंपरा को जोड़ा जाता है।महिलाएं पारंपरिक रूप से यहाँ अपने भाइयों को राखी बांधने से पहले प्रार्थना करती हैं, जबकि स्थानीय प्रसाद जैसे मक्खन, घी, रोट और चूरमा भी इस उत्सव से जुड़े होते हैं।
बंसी नारायण नाम से भले ही भगवान श्रीकृष्ण की बांसुरी का आभास होता हो, लेकिन मंदिर में भगवान विष्णु की चतुर्भुज प्रतिमा विराजमान है। मंदिर परिसर में गणेश, भैरव, कुबेर, घंटाकर्ण और वन देवियों की मूर्तियां भी स्थापित हैं।

दूरदराज़ हिमालयी वातावरण से घिरे यह मंदिर रक्षा बंधन को सिर्फ एक पारिवारिक रिवाज से कहीं बड़ा बना देता है — यह एक परंपरा है जो पूरी समुदाय में पीढ़ी दर पीढ़ी निभाई जाती है।

सुरक्षा, विश्वास का त्योहार और एक मंदिर जो एक असाधारण दिन के लिए जीवंत हो उठता है।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस क्षेत्र का संबंध पांडवों की तपस्या से भी रहा है। भगवान विष्णु की लीलास्थली माने जाने वाले इस क्षेत्र के आसपास कल्पेश्वर और रुद्रनाथ जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल स्थित हैं। ऊंचे हिमालय, दूर तक फैले बुग्याल और प्राकृतिक सौंदर्य श्रद्धालुओं के साथ पर्यटकों को भी आकर्षित करते हैं।
कई गांवों से पहुंचते हैं श्रद्धालुरक्षाबंधन के अवसर पर डुमक, कलगोठ, पल्ला, किमाणा, उर्गम, ल्यांरी-थैणा, भेंटा, भरकी, पिलखी और अरोसी सहित आसपास के क्षेत्रों से लोग बंसी नारायण पहुंचते हैं। श्रद्धालु भगवान नारायण को राखी अर्पित कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

