विवेकपूर्ण जीवन है गणेश पूजा: मोरारी बापू

मोहक मीडिया। आदि जगदगुरु शंकराचार्य महाराज जी ने जिन पांच देवों की पूजा करने के लिए हमसे कहा है, उनमें गणेश का नाम सबसे पहले है। गणेश पूजा हम करते हैं। विशेष दिनों में तो गली-गली में उत्सव मनाया जाता है। लोकमान्य तिलक ने विशेष रूप से इस पर बल दिया। देश काल के अनुसार थोड़ा प्रेक्टिकल भी होना पड़ेगा। मेरी व्यासपीठ युवा भाई बहनों से कहती रहती है कि गणेश की रोज आप पूजा करें तो आप वंदनीय हैं लेकिन व्यस्तता या किसी भी कारण से स्थूल रूप से पूजा ना कर पाएं तो याद रखें कि गणेश विनय के देवता हैं। विवेक के देवता हैं। व्यक्ति के जीवन में विनय बना रहे, विवेक बना रहे, ये ही गणेश पूजा है। खासकर युवानी विनयी हो, विवेकी हो तो यह गणेश पूजा है। युवान भाई बहनों से विशेष कहूं कि हम विवेक से जिएं तो निरंतर गणेश की पूजा कर रहे हैं। 24 घंटे में से 12 घंटे गणेश की अथर्वशीर्ष से पूजा करो, गणेश का बड़े-बड़े मंत्रों से वंदन करो लेकिन विवेक शून्यता है तो बात अधूरी है।

विवेक गणेश पूजा है। बुजुर्गों का आदर करो, हमउम्र लोगों से प्रीत से मैत्री करो और छोटे को वात्सल्य से नहला दो, यह विवेक गणेश की पूजा है। विवेक से नाक बढ़ेगी। गणेश की सूंड बहुत लंबी होती है। नाक बढ़ेगी यानि प्रतिष्ठा बढ़ेगी, इज्जत बढ़ेगी। चाणक्य कहता है कि बुजुर्गों को विवेक से आदर देने से चार चीजें बढ़ती हैं… आयु, विद्या, यश और बल। कोई धर्म विवेक को अस्वीकार नहीं कर सकता। सबको स्वीकार करना ही पड़ेगा। विवेक सारभौम सूत्र है। इसलिए विवेक को किसी जाति या धर्म की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता। यह जगत कल्याण का, मानव कल्याण का सूत्र है। इसलिए गणेश की उपासना सबसे पहले की जाती है। अथर्वशीर्ष में गणेश को सबसे बड़ा ब्रह्म बताया।

गणेश को सनातन धर्म में प्रथम पूजा जाता है। गणेश को मोदक पसंद है।

मोद का का अर्थ है आनंद। क: का अर्थ है ‘छोटा अंश’। आध्यात्मिक रूप से यह ज्ञान, मोक्ष और परमानंद का प्रतीक माना जाता है। हाथ में पकड़ा हुआ मोदक इस बात का प्रतीक है कि गणेश के पास अपने भक्तों को आनंद प्रदान करने की क्षमता है। व्यावहारिक रूप में देखें तो जहां विवेक होता है, वहां आनंद आ ही जाता है। विवेक सही और गलत के बीच की पहचान करवाता है। विवेकपूर्ण निर्णय लेकर जब व्यक्ति सही मार्ग पर चलता है तो कई बाधाओं से भी बच जाता है। इसीलिए विवेक रूपी गणेश को विघ्नहर्ता भी बताया गया है। विवेक में विघ्न को हरने की स्वाभाविक क्षमता है।

मानस में कहा गया है… बड़े भाग मानुष तन पावा, सुर दुर्लभ सदग्रंथनि गावा। जगद्गुरु शंकराचार्य ने जी भी जो तीन चीज दुर्लभ बताई हैं, उसमें मनुष्य शरीर को एक रखा है। ठाकुर रामकृष्ण परमहंस के पास भी ऐसा ही शरीर था, मस्तिष्क था जो हमारे पास है लेकिन ठाकुर विवेकानंद को, मीरा को, एकनाथ को, ज्ञानेश्वर को, तुकाराम को, रमण महर्षि को, मेहता नरसी को, कबीर साहब को, बुद्ध को अनादिकाल से चले आ रहे संतों को, फकीरों को, जेनों को जो आनंद की अनुभूति हुई, जो ईश्वर से निकटता का अहसास हुआ, वो हमें क्यों नहीं होता? इसका एक बड़ा कारण विवेक से चुकना है। लोकमान्य तिलक ने कहा था आजादी मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। हम इसी जीवन में ईश्वर की प्राप्ति करें, परम का अनुभव करें, यह हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है फिर भी हम वंचित क्यों हैं? शायद इसीलिए कि हम विवेक के साथ नहीं जी रहे।

मैंने बार-बार कहा है तीन चीजें मोद यानि सहज आनंद पाने में बाधक है- ईर्ष्या, निंदा और द्वैष। काम, क्रोध और लोभ की तो जीवन में सम्यक मात्रा में जरूरत है। आयुर्वेद कहता है शरीर में वात पित्त कफ सम्यक मात्रा में होता है। सम्यक मात्रा न होने पर रोग होता है। मैं आपसे पूछूं, गौर करके देखिएगा कि ईर्ष्या, निंदा और द्वैष की क्या हमें ज़रूरत है? कोई कारण दे सकते हैं आप? ये हमारे जीवन के मोद के लिए बाधक हैं। विवेक हमें समझ देता है कि इनकी कोई जरूरत नहीं है। विवेक कहता है कि ईर्ष्या की जगह हम सामने वाले के लिए शुभ की इच्छा क्यों न करें? निंदा की जगह निदान क्यों न कर सकें?

जीवन में परम आनंद की अनुभूति ना होने का कारण कई बार यह होता है कि जीवन की दिशा ठीक नहीं होती। हमने उसे सही दिशा में मोड़ा नहीं है। विवेक कहता है कि जीवन को अनुकूल दशा में रखो तो अंदर की बीमारी मिट जाएंगीं। मेरी दशा सही नहीं है, यह कहते हुए सर मत पकड़ो, दिशा बदल दो। जीवन में मोदक फूटेगा।

जीवन से तीन सूत्र जुड़े हैं- कर्म, विश्वास और संबंध। जीवन के इन तीनों पहलुओं पर बिना विवेक के नहीं चलना चाहिए। अब प्रश्न ये है कि विवेक आए कहां से? विवेक कोई भौतिक वस्तु नहीं है जो कहीं से उठा लाएं या खरीद लाएं।

रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास ने लिख दिया है कि

विवेक सत्संग से ही आता है…

बिनु सतसंग बिबेक न होई/ रामकृपा बिनु सुलभ न सोई।

जीवन में बदलाव के लिए सही दिशा में बढ़ने के लिए सत्संग जरूर करें। सत्संग से प्राप्त विवेक हमें बताता है कि भक्ति मार्ग पर चलने वालों को किसी की राह का रोड़ा नहीं बनना चाहिए। व्यक्ति किसी की राह का रोड़ा न बने और स्वयं किस राह पर है, इस पर नज़र रखता रहे। अगर व्यक्ति के ज्ञान, बुद्धि और विवेक की दिशा ठीक है तो वह समझ जाएगा कि परमात्मा की निकटता पाने के लिए चाहे कितने ही रास्ते उपलब्ध हों, लेकिन सबसे आवश्यक है कि हमारे भीतर सत्य, प्रेम व करुणा का भाव हो।

गणेश से जुड़ी कथा से हम सभी परीचित हैं। मां पार्वती के कहने पर वह द्वारपाल के रूप में सावधानी के साथ खड़े हैं कि कोई अंदर ना आए। विवेक हमें हर समय सावधान रखता है। अमृत विष, कुसंग सत्संग, सोना मिट्टी के बीच हमें सचेत रखता है।

विपत्ति के काल में सब मित्र और परिचित साथ छोड़ सकते हैं तब विवेक साथ बना रहेगा। उस स्थिति में किसी से बदले की भावना मन में ना रहे, उसी का नाम विवेक है। हर मित्र आकारधारी है मगर विवेक निराकारी है। विवेक हमारा भीतरी मित्र है।

दोहावली रामायण में तुलसी दास जी ने लिखा है-

तुलसी असमय के सखा धीरज धरम बिबेक।

साहित साहस सत्यब्रत राम भरोसो ऐक।

जो सात वस्तु विकट समय में हमारे साथी बन कर खड़े रहते हैं, उनमें विवेक भी है। और जैसा मैने कहा, विवेक सत्संग से प्राप्त होता है। गर्मी में आप गन्ने को बूंद बूंद निचोड़ कर गिलास भर लें लेकिन यदि उसे पिएं नहीं तो क्या लाभ? हम शास्त्रों को निचोड़ कर जूस निकालते हैं लेकिन उसे अगर पिएं नहीं तो क्या होगा? सत्संग का जो रस है विवेक, अगर उसे व्यवहार में न लाएं तो कुछ हासिल नहीं होगा। यह विवेक ही असमय का सखा है। अयोध्या का राज कौन रखे, कोई निर्णय नहीं हो पा रहा था। पौराणिक कथा के अनुसार धरती को वाराह भगवान ने बचाया था। अब ऐसा ही समय अयोध्या में था जब शोक उसको ग्रास बना रहा था। ऐसे में कौन बचाए? चित्रकूट के असमय में भरत का जो विवेक है, वह वाराह बन गया। दिनकर जी की बहुत प्रसिद्ध पंक्तियां हैं जो उन्होंने रश्मि रथी में लिखी हैं- जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है। सर्वनाश के समय विवेक ही वाराह अवतार है। हमारी मति को बचा लेता है। मानस का अरण्यकांड विवेक प्रदान करता है।

विवेक हमें बताता है कि सुख पाना है सो अच्छा संग करें। दुख को भगाना है तो शुभ सुनें। हम अक्सर घरों और दुकानों के बाहर चौखट पर लिखा देख ते हैं.. शुभ लाभ। विवेक हमें बताता है कि प्रत्येक लाभ शुभ हो, यह आवश्यक नहीं है लेकिन प्रत्येक शुभ लाभकारी ही है। इसलिए लाभ से पहले शुभ की कामना करो।

प्रस्तुति: राज कौशिक

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