कहते हैं भागीरथ की तपस्या गंगा को स्वर्ग से धरती पर लाई, और भगवान शिव ने उसका वेग अपनी जटाओं में सँभाला। वही माँ गंगा आज भी करोड़ों की जीवनरेखा है।
गंगा दशहरा की भोर से ही श्रद्धालु घाटों पर पहुँचने लगे। आस्था की डुबकी लगाई, माँ गंगा का पूजन किया और परिवार की सुख समृद्धि की कामना की। हवन, मंत्रोच्चार और शंखध्वनि से पूरा तट भक्तिमय हो उठा।
जल पुलिस, गोताखोर और पीएसी की तैनाती के बीच स्नान पूरी तरह सुरक्षित और व्यवस्थित रहा। साफ सीढ़ियाँ, वस्त्र परिवर्तन कक्ष और बुनियादी सुविधाओं ने श्रद्धालुओं का अनुभव सहज बना दिया।
स्नान के बाद कई श्रद्धालुओं ने घाटों की स्वच्छता और माँ गंगा की अविरलता को सराहा। आस्था और स्वच्छता जब साथ चलें, तभी पर्व का अर्थ पूरा होता है।

